प्रयागराज न्यूज डेस्क: पितृपक्ष के दिनों में संगम नगरी प्रयागराज में श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ गई है। देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग संगम तट पर पहुंचकर अपने पितरों का तर्पण और पिंडदान कर रहे हैं। सुबह से ही संगम किनारे मंत्रोच्चार के बीच लोग अपने माता-पिता, दादा-दादी और पूर्वजों को याद करते हुए उनकी आत्मा की शांति और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना कर रहे हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार प्रयागराज में पिंडदान और तर्पण का खास महत्व माना जाता है।
सनातन परंपरा में पितृपक्ष को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता जताने का समय माना गया है। धार्मिक मान्यताओं में प्रयाग को विष्णु का मुख, काशी को विष्णु की नाभि और गया को विष्णु के चरण बताया गया है। इसी वजह से प्रयाग, काशी और गया को पितृ कर्म के लिए खास माना जाता है। मान्यता है कि श्रद्धालु प्रयागराज में पिंडदान और तर्पण के बाद काशी और फिर गया में पितृ कर्म करते हैं। गया में पिंडदान के बाद इस धार्मिक प्रक्रिया को पूरा माना जाता है।
हालांकि हर श्रद्धालु के लिए इन तीर्थस्थलों तक पहुंचना आसान नहीं है। इसी को देखते हुए प्रयागराज के तीर्थ पुरोहितों ने अब ऑनलाइन पिंडदान और तर्पण की व्यवस्था भी शुरू की है। जो लोग विदेश में हैं, दिव्यांग हैं या किसी दूसरी वजह से प्रयागराज नहीं आ सकते, वे घर बैठे ऑनलाइन माध्यम से पूजा में शामिल हो सकते हैं। तीर्थ पुरोहित वीडियो कॉल और ऑनलाइन माध्यम से पूजा की विधि कराते हैं, जबकि श्रद्धालु अपने स्थान से ही संकल्प और पूजा में हिस्सा लेते हैं।
संगम तट पर इस दौरान कोई अपने पिता के नाम से पिंड चढ़ा रहा है तो कोई दादा और परदादा को याद कर रहा है। मंत्रों की गूंज के बीच श्रद्धालु अपने पितरों की शांति और परिवार के लिए सुख-शांति की प्रार्थना कर रहे हैं। तीर्थ पुरोहितों का कहना है कि ऑनलाइन व्यवस्था का मकसद उन लोगों को भी अपनी परंपरा और पितरों से जोड़ना है, जो किसी मजबूरी के चलते प्रयागराज नहीं पहुंच पा रहे हैं। फिलहाल पितृपक्ष के चलते संगम तट पर पिंडदान और तर्पण का सिलसिला लगातार जारी है।