प्रयागराज न्यूज डेस्क: प्रयागराज में दीपावली की तैयारियों के बीच अलोपी मंदिर के पास स्थित कुम्हार बस्ती में इन दिनों काम काफी बढ़ गया है। यहां सुबह होते ही चाक घूमना शुरू हो जाता है और देर रात तक मिट्टी के दीये बनाने का सिलसिला चलता रहता है। किसी घर में दीये बनाने के लिए मिट्टी तैयार की जा रही है, तो कहीं चाक पर उन्हें आकार दिया जा रहा है। कुछ कुम्हार हाथ से चलने वाले चाक का इस्तेमाल कर रहे हैं, जबकि कुछ ने काम तेजी से पूरा करने के लिए इलेक्ट्रिक चाक लगा रखे हैं।
इस काम में पुरुषों के साथ महिलाएं भी बराबर का हाथ बंटा रही हैं। मिट्टी तैयार करने, दीये बनाने, उन्हें सुखाने और फिर भट्ठे में पकाने तक की जिम्मेदारी पूरा परिवार मिलकर संभाल रहा है। दीपावली नजदीक आने के साथ ही मिट्टी के दीयों की मांग बढ़ रही है। कुम्हारों का कहना है कि इस बार काम इतना ज्यादा है कि सुबह से देर रात तक काम करने के बावजूद उन्हें आराम का समय नहीं मिल पा रहा है।
कुम्हार श्याम बाबू प्रजापति बताते हैं कि काम की अधिकता के चलते कई बार खाने-पीने का समय भी नहीं मिल पाता। हालांकि, उन्हें इस बात की खुशी है कि लोग फिर से मिट्टी के दीयों को पसंद कर रहे हैं। उनके लिए दीपावली का यह सीजन सिर्फ त्योहार नहीं, बल्कि सालभर की कमाई का एक अहम मौका भी है। इसी दौरान मिलने वाले काम से उनके परिवार का गुजारा चलता है, इसलिए दीयों की बढ़ती मांग उनके लिए उम्मीद लेकर आई है।
एक दीये को तैयार करने में लगती है कई दिनों की मेहनत
मिट्टी का छोटा सा दीया बनाने के पीछे कई चरणों की मेहनत होती है। सबसे पहले मिट्टी लाई जाती है और उसे अच्छी तरह तैयार किया जाता है, ताकि चाक पर उसे आसानी से आकार दिया जा सके। इसके बाद एक-एक करके दीये बनाए जाते हैं। फिर उन्हें धूप में सुखाने के बाद भट्ठे में पकाया जाता है। इन सभी प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद ही दीये इस्तेमाल के लिए तैयार होते हैं। ऐसे में दीपावली की रात घरों में जलने वाले हर दीये के पीछे कुम्हार परिवार की कई दिनों की मेहनत छिपी होती है।
मिट्टी के दीयों की मांग से बंधी हैं उम्मीदें
समय के साथ दीपावली मनाने का तरीका बदला है। बाजार में बिजली की लड़ियों से लेकर सजावट के कई नए सामान उपलब्ध हैं, लेकिन मिट्टी के दीयों की अहमियत आज भी बनी हुई है। कुम्हारों को उम्मीद है कि इस बार भी लोग अपने घरों में मिट्टी के दीये जलाकर इस परंपरा को आगे बढ़ाएंगे। इससे न सिर्फ त्योहार की पुरानी परंपरा कायम रहेगी, बल्कि उन परिवारों को भी रोजगार मिलेगा, जिनकी आजीविका इसी काम पर निर्भर है।
प्रयागराज की इस कुम्हार बस्ती में घूमता चाक सिर्फ मिट्टी को दीये का आकार नहीं दे रहा, बल्कि कई परिवारों की उम्मीदों को भी नई दिशा दे रहा है। दीपावली की रात जब इन दीयों से घर रोशन होंगे, तो उनकी रोशनी में कुम्हारों की मेहनत और उनके परिवारों की खुशियां भी शामिल होंगी।