प्रयागराज न्यूज डेस्क: कानपुर स्थित Indian Institute of Technology Kanpur (आईआईटी कानपुर) के एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अध्ययन ने उत्तर प्रदेश के दो बड़े शहरों—Kanpur और Prayagraj—के लिए गंभीर चेतावनी जारी की है। प्रोफेसर Nihar Ranjan Patra के नेतृत्व में किए गए इस शोध में कहा गया है कि यदि 6.5 या उससे अधिक तीव्रता का भूकंप आता है तो खासकर गंगा तटवर्ती और निचले इलाकों में भारी तबाही हो सकती है। इन क्षेत्रों की ढीली और रेतीली मिट्टी झटकों को और अधिक तीव्र बना सकती है, जिससे जमीन धंसने जैसी स्थिति पैदा हो सकती है।
करीब 17 वर्षों तक चले इस अध्ययन में पाया गया कि दोनों शहरों की बड़ी आबादी ऐसे क्षेत्रों में रहती है जहां की मिट्टी भूकंपीय गतिविधि के दौरान ज्यादा कंपन करती है। शोध में ‘लिक्विफैक्शन’ (Liquefaction) की आशंका भी जताई गई है, जिसमें तेज झटकों के दौरान ठोस जमीन दलदली या रेत जैसी व्यवहार करने लगती है। ऐसी स्थिति में इमारतों की नींव कमजोर पड़ सकती है, सड़कें फट सकती हैं और पुराने मकान ढहने का खतरा बढ़ जाता है।
यह परियोजना वर्ष 2008 में शुरू हुई थी। शोध दल ने लगभग 20 स्थानों से मिट्टी के नमूने एकत्र किए और कंप्यूटर सिमुलेशन के माध्यम से विश्लेषण किया। निष्कर्षों में बार-बार नदी किनारे के क्षेत्र, पुराने मोहल्ले और घनी आबादी वाले इलाके सबसे अधिक संवेदनशील पाए गए। यदि 6.5 से अधिक तीव्रता का भूकंप आता है तो सड़कों में दरारें, इमारतों का झुकना या गिरना और स्कूलों, अस्पतालों व सरकारी भवनों को गंभीर नुकसान हो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस चेतावनी को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। नए निर्माण में भूकंपरोधी मानकों का सख्ती से पालन, पुराने भवनों का सुदृढ़ीकरण, जनजागरूकता अभियान और मजबूत आपदा प्रबंधन तंत्र की स्थापना बेहद जरूरी है। वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि खतरा जमीन के नीचे मौजूद है—अब सवाल यह है कि क्या शहर समय रहते खुद को तैयार कर पाएंगे।